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युग-पुरुष महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज

बाल जीवन की कुछ प्रमुख घटनाएँ :-

गोरखनाथ मंदिर पर आने के पश्चात् उनको योगिराज गम्भीरनाथजी की कृपा प्राप्त हो गई थी। संभवतः बालक की विलक्षण प्रतिभा को पहचान कर ही उन्होंने उसे संरक्षण देना प्रारम्भ कर दिया था। योगिराज गम्भीरनाथजी महान विभूति सम्पन्न सिद्ध योगी थे। वे आधिभौतिक संबंधों का परित्याग कर चुके थे। उनके स्वाभाविक गाम्भीर्य एवं तपोपूत निःस्पृह व्यक्तित्व से प्रभावित बालक नान्हू सिंह के मन में एक आध्यात्मिक जिज्ञासा बलवती होने लगी। योगिराज गम्भीरनाथ जी ने उन्हें अपने शिष्य महात्मा ब्रह्मनाथ जी के सरंक्षण में देकर उनके पालन-पोषण तथा शिक्षा आदि की पूरी व्यवस्था कर दी थी। योगिराज सिद्ध महात्मा थे। बालक के प्रति उनके मन में अपार स्नेह था।

योगिराज अपने योगबल से अलौकिक कार्य करने में समर्थ थे। उन्होंने बालक नान्हू सिंह के जीवन को प्रभावित करने वाले अनेक चमत्कारिक कार्य किये थे, जिनका उल्लेख ब्रह्मलीन महंत जी प्रायः किया करते थे। 8-9 वर्ष की अवस्था में बालक नान्हू सिंह गम्भीर रूप से बीमार पड़े। उनका शरीर ज्वर-ताप से दग्ध होने लगा। जब साधुओं ने योगिराज को बालक की बीमारी का समाचार सुनाया तो उन्होंने एक कूड़ी के जल पर हाथ फेर कर उन्हें पिला दिया। ज्वर का ताप तत्काल समाप्त हो गया।

इसी तरह 13-14 वर्ष की अवस्था में एक घटना और घटित हुई। एक दिन एक वृद्ध एक पुरानी अचकन और पाजामा लिए हुए आया। पूज्य योगिराज के आदेश से नान्हू सिंह ने इच्छा न रहते हुए भी उसे धारण कर लिया। उसकी जेब में हाथ डाला तो उसमें से केशों का एक लट निकला। रात्रि में उन्हें जोर का बुखार चढ़ा और दो-एक दिनों के पश्चात चेचक निकल आई। चेचक का इतना भयंकर प्रकोप हुआ कि उससे बचना असम्भव ज्ञात होने लगा। जब योगिराज गम्भीरनाथ जी को बालक के संज्ञाशून्य होने का समाचार दिया गया तो उन्होंने उनके निश्चेष्ट शरीर को मंगवाकर अपनी चारपाई के नीचे रखवा लिया। सवेरे लोगों ने उन्हें जीवित पाया।

अन्य घटनाएँ :-

स्थानीय हाई स्कूल में उनके एक अध्यापक यदुनाथ चक्रवर्ती थे। वे बड़े ही सरल स्वभाव वाले थे। राणा नान्हू सिंह के हृदय में उनके प्रति सात्विक श्रद्धा थी। उक्त अध्यापक को अवकाश प्राप्ति की आयु के पूर्व ही विद्यालय की सेवाओं से मुक्त कर दिया गया। उस समय राणा नान्हू सिंह गोरक्षनाथ मंदिर के महन्त हो चुके थे। उन्होंने अपने अन्य सहयोगियों से परामर्श कर तत्काल एक नये विद्यालय की स्थापना कर दी। यह विद्यालय ‘गुडलक विद्यालय’ के नाम से बक्शीपुर मुहल्ले में एक किराये के मकान में प्रारम्भ हुआ और श्री यदुनाथ चक्रवर्ती को ही विद्यालय को संचालित करने का कार्य सौंपा गया। उन्हें उसका प्रधानाचार्य बना दिया गया। कालांतर में इसी विद्यालय ने विकसित होकर महाराणा प्रताप इण्टर कालेज का रूप धारण कर लिया।

विद्यार्थी जीवन में अपने शिक्षा-गुरु के प्रति उनके मन में जो श्रद्धा और आदर का भाव था, उसी के निर्वाह के लिए उन्होंने इतने बडे विद्यालय की स्थापना कर डाली। यह वस्तुतः उनके स्वाभिमान और गुरुभक्ति का सच्चा उदाहरण है।

गद्दी के लिए विवाद, दीक्षा और अभिषेकः-

सन् 1921 ई0 में छात्र जीवन का परित्याग करने के बाद राणा नान्हू सिंह राजनीतिक कार्यों में अधिक रुचि लेने लगे। इधर गोरखपुर मठ के महंत पद को लेकर पहले से ही विवाद चल रहा था। तत्कालीन महंत सुन्दरनाथ जी तथा महंत ब्रह्मनाथजी का स्वत्वाधिकार संबंधी विवाद हाईकोर्ट तक पहुँच गया था। इन आंतरिक एवं बाह्य, गृह संबंधी एवं राजनीतिक विवादों में फंसकर जीवन का अस्त-व्यस्त हो जाना स्वाभाविक है। किन्तु उन्होंने बड़े ही धैर्य के साथ परिस्थितियों का सामना किया और अन्ततः वे विजयी रहे।

विवाद

सन् 1880 ई0 में महंत गोपालनाथजी की महासमाधि के पश्चात् योगिराज गम्भीरनाथ जी के ज्येष्ट गुरुभाई महात्मा बलभद्रनाथजी महंत हुए। सन् 1881 में उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके शिष्य बाबा दिलवरनाथ गद्दी पर आसीन हुए। 14 अगस्त सन् 1896 को उनका देहांत हो गया। उस समय समस्त साधु-संतों ने योगिराज गंभीरनाथ जी से गद्दी पर ...