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गोरख दर्शन की उपादेयता

प्राचीन काल से विभिन्न दार्शनिकों ने शाश्वत सत्य के साक्षात्कार को ही दर्शन का मूल आधार माना है। वे आत्मा में विश्वास करते रहे और उसी के यथार्थ रूप को जानने का सतत प्रयत्न भी होता रहा। उपनिषद, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, वेदान्त आदि सभी दार्शनिक की जिज्ञासा का चरम लक्ष्य आत्मा की खोज रहा है। इनके अनुसार जगत का सार परम तत्व ब्रह्म है। ब्रह्म, अनन्त, नित्य, सर्वव्यापी, सर्वज्ञानी और पूर्ण चैतन्य है। वही सब की आत्मा है। वह सत् है, जगत का आधार और सूक्ष्म है। इसी ब्रह्म अथवा आत्म चेतना या प्रज्ञा (Self Consciousness) को ही परम् तत्व माना गया है।
महायोगी गोरखनाथ जिन्हें भगवान शंकर का अवतार तथा नाथ सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना गया वे भी भारतीय संस्कृति की उसी मूल दार्शनिक विचारधारा का मानव के लिये एक प्रभावशाली तथा पुण्य सन्देश दिया है। उनके दार्शनिक विचार प्राचीन दर्शन शास्त्रों पर आधारित सहस्त्रों वर्ष प्राचीन है। इतना होने पर भी उनकी यह प्राचीन दार्शनिक विचारधारा वर्तमान युग के लिये महत्वपूर्ण सन्देशवाहक है, जिसको अपनाकर आज का मानव भी अपना बाह्य तथा अन्तर्मुखी समन्वय जीवन मे पूर्णरूपेण सार्थक कर सकता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक शायद ही कोई प्रदेश होगा जहाँ गोरक्षनाथ के मठ तथा मन्दिर और विभिन्न जातियों के उनके अनुयायी न हों। उनके मत का यह विस्तार गोरक्षनाथ के महिमान्वित, प्रभावशाली व्यक्तित्व तथा सर्वग्राही दार्शनिकता का जीता जागता प्रमाण है। परिणामतः गोरक्षनाथ के जीवन काल से आज तक अनेक धर्म, नेता तथा प्रचारक उत्पन्न होते रहे जो अपनी सहज साधना पद्धति द्वारा जन जीवन को आकर्षित करते रहे हैं। इस प्रकार गोरक्षनाथ अपनी दार्शनिक विचारधारा के साथ-साथ अमर है।
गोरक्षनाथ तथा उनके अनुयायियों का पूर्ण विश्वास है कि उन परम आत्मा की खोज में जीव को कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। वह तो उसी के भीतर निहित है जैसे अग्नि काष्ठ में, बीज में वृक्ष तथा पुष्प में गंध अन्तर्व्याप्त है। इसी परम तत्व की प्राप्ति के लिये उन्होंने काया सिद्धि का मार्ग प्रस्तुत किया है। है। काया सिद्धि अथवा काया संशोधन एक प्रकार का योग मार्ग है जो हठयोग के नाम से अभिहित है। इस मार्ग के अभ्यास के लिये मानव को किसी विशेष वातावरण की आवश्यकता नहीं, यह संन्यासी तथा गृहस्थ दोनों के लिये समान रूप से ग्राह्य है। वे आत्मानुभूति के लिये योगाभ्यास को आवश्यक मानते हैं। उन्होंने अपने सुव्यवस्थित हठयोग द्वारा एक ऐसी साधना पद्धति को जन जीवन के सम्मुख रखा है जो समस्त मार्गों, वर्णों आदि द्वारा सरलता से ग्रहण की जा सकती है।
गोरक्षनाथ ने कभी विभिन्न दार्शनिक वादविवादों में स्वयं को नहीं उलझाया। उनकी मान्यता है कि समस्त दर्शनों की नींव एक ही है और उनका अन्तिम ध्येय भी एक ही है। इसीलिये उनके सिद्धान्तों की बागड़ोर इतनी सर्वतोमुखी है कि आत्मानुभूति की ओर अग्रसर हुआ कोई भी जाति या वर्ण का या किसी सम्प्रदाय का मतानुयायी साधक गोरक्षनाथ की साधना पद्धति द्वारा अपने लक्ष्य को सरलता से प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार गोरक्षनाथ ने अपने योगमार्ग द्वारा आत्मनिरीक्षण तथा आत्म संयम का सन्देश दिया है जो साधक की अन्तर्मुखी साधना में सहायक है।
गोरक्षनाथ का विश्वास है कि केवल अन्तर्मुखी साधना की स्थिति मानव में तब तक सम्भव नहीं जब तक उसका बाह्य जीवन संयमित न हो। बहिर्मुखी साधना के लिये उन्होंने विभिन्न प्रकार के उपदेशों द्वारा मानव का मार्ग प्रदर्शन किया है। उनके दर्शन की भित्ती शुद्धाचार तथा समाज सुधार की आधारशिला पर स्थित है। जब तक मानव अपना आचरण नहीं सुधारेगा तब तक उसके लिये भी किसी प्रकार की साधना पद्धति, अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति में निरर्थक सिद्ध होगी। आज कल के बहुत से योगी इस विचारधारा के साक्षी हैं, जो शुद्धाचरण के अभाव में मोहग्रस्त होकर, यौगिक साधना द्वारा प्राप्त सिद्धियों से जन जीवन को लालायित करते हैं। इसके पीछे उनकी धन संगठन करने की स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति निहित है। इस प्रकार के साधक जो योगाभ्यास में तो सफल हो गये किन्तु सांसारिक प्रलोभनों से जिनकी निवृत्ति नहीं हुई, वे कभी भी अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते। गोरखनाथ ने इस प्रकार की आचरणहीन साधना को कदापि नहीं माना है। उनकी साधना में शुद्ध आचरण के साथ यौगिक संयम की आवश्यकता है। यौगिक साधना व्यक्तिगत है और उसके साथ शुद्ध आचरण का समन्वय समष्टिगत हो सकता है।
इस व्यष्टि में समष्टि की भावना, एक में अनेक तथा अनेक में एक की विचारधारा को गोरक्षनाथ ने सामरस्य द्वारा प्रस्तुत किया है। जब प्रत्येक मानव यह सोचने लगे कि संसार में जो कुछ है उसके भीतर भी वही परम तत्व व्याप्त है। सब कुछ अनेक होते हुये भी एक ही सूत्र में अनुस्यूत है। गोरक्षनाथ ने अपनी इस व्यष्टि में समविष्ट की विचारधारा को तथा ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने की अथवा परमात्मा और जीव के एकीकरण को सामरस्य की उपाधि दी है। गोरक्षनाथ तथा उनके सिद्ध योगी सम्प्रदाय का आदर्श यही सामरस्य है। यह प्रत्येक अणुमात्र तत्व का समीकरण है। समग्र जीवन और जीवन के सर्वांगीण अनुभवों का एकीकरण, मधुरतम और सम्पूर्ण व्यवस्था के आदर्श को सामरस्य कहा गया है। जीवन की विविध श्रेणियों में और भिन्न-2 अवस्थाओं में इस प्रकार का बाह्य और आन्तरिक समन्वय अत्यन्त उपकारक हो सकता है। है। मानव के लिये भौतिक, बौद्धिक तथा नैतिक जीवन में इस प्रकार का सामरस्य अपेक्षित है। जीवन के पारस्परिक संबंधों में चाहे वे मानवों से हों, प्राणियों से हो या सारे संसार से हो सर्वत्र सामरस्य की सतत तथा अखण्ड अनुभूति हो। जीवन की विविधताओं में, विभिन्न अभिप्रायों में, एकात्मकता और सौन्दर्य की अनुभूति ज्ञान, कार्यों तथा अभीष्ट के द्वारा सम्भव हो, जो उस क्रियाशील परमात्मा सच्चिदानन्द के भीतर निहित तथा सुसगठित, उन्हीं के अनुभव मात्र है। मानव यदि इस भावना का अनुभव कर सके तो उसके जीवन में सम्पूर्ण समता और शान्ति का आविर्भाव होगा। जब यह एक में अनेक और अनेक में एक की भावना और अनुभव जन जीवन में व्याप्त हो जायेगी, तब ही इस पतनशील विश्व का उद्धार होगा। इस भावना से परिपूर्ण होने पर वह सब के प्रति पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से व्यवहार करने योग्य हो जाता है क्योंकि उसे यह प्रतीति हो गई है कि वह और चराचर जगत के समस्त पदार्थ एक ही विश्वात्मा के विराट शरीर के अंग हैं। इस प्रकार सामरस्य के महत्तर आदर्श के साक्षात्कार के लिये शरीर, इन्द्रियाँ और प्राणमय तत्वों का तथा मानसिक वृत्तियों पर सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त करना अति आवश्यक है। इसकी सुव्यवस्था के लिये मानव के लिये परिमार्जित तथा प्रकाशित बुद्धि अपेक्षणीय है। मानव की चेतना का स्तर उत्तरोत्तर ऊँचे स्थान पर पहुँचने योग्य हो। गोरखनाथ अपने अनुभवों से यह सिद्ध करते हैं कि अन्तर स्वभाव से मानव के पास एक ऐसी भीतरी शक्ति है, जिसके सहारे वह अपनी शारीरिक, प्राणमय, ऐन्द्रिक तथा मानसिक अवस्था पर, और साथ-2 बाह्य जगतके आन्दोलनों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त कर सकता है। यह भी बताया गया है कि अपने स्वभाव पर संपूर्ण अधिकार रखने, बाह्य जगत की समस्त शक्तियों को वशीभूत करने का यह समर्थ मार्ग है। जो स्वराट होता है वही समराट हो सकता है।
संयमी योगी स्वभाव से समुद्र के समान प्रशान्त, आकाश के समान निर्मल, वायु के समान सर्वत्र गतिमान और विश्व जननी प्रकृति के सम्पूर्ण सामर्थ्य से ओत-प्रोत होता है। इस प्रकार का सिद्ध योगी परमात्मा सच्चिदानन्द के अनन्त और अनेक प्रकार के परस्पर विरोधी आविर्भाव में भव्य समन्वय और सौन्दर्य का समीकरण है, और इसके आनन्द का उपयोग करता है। उसका व्यक्तित्व विराट ऐसा एकतर हो जाता है कि विश्वात्मा और विश्व प्रकृति का वह एक दिव्य चरण बन जाता है।
प्राचीन काल में प्रस्तुत योग मार्ग के अद्भुत विकास द्वारा गोरक्षनाथ ने इसे सामरस्य की उपलब्धि का उत्तम मार्ग माना है। यह योग पद्धति इतनी व्यापक है कि समस्त मार्गों के साधक इसके आश्रय में अपना जीवन कृतार्थ करते हैं, तथा बाह्य और अन्तर्मुखी जीवन के व्यवहार में, सम्पूर्ण शान्ति तथा आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। जब इस प्रकार के समन्वय और आनन्द की पूर्णता योगी को प्राप्त होती है तब केवल सामरस्य का परिपाक मानस चेतना में होता है। गोरखक्षनाथ की योग पद्धति पुरातन है किन्तु जीर्ण नहीं। आधुनिक काल और आज के मानव के लिये यह इतनी ही उपकारक है जितनी पूर्व काल में थी। मनुष्य चाहे कर्मयोगी हो, ज्ञानयोगी हो या भक्ति मार्ग का हो, प्रत्येक साधक के लिये आत्म संयम, चरित्र संगठन, मानसिक तथा बौद्धिक विकास के लिये, इस योग पद्धति का सहारा अनिवार्य है, क्योंकि आत्म संयम के अभाव में कोई भी योगी नहीं बन सकता, चाहे कर्म का हो, या भक्ति का हो।
योग साधना के अन्तिम अंग पूर्णता अथवा निर्विकल्प समाधि को प्राप्त होकर भी, सम्पूर्णता या पूर्ण जीवन की अभीप्सा वाला योगी तृप्त नहीं होता और न निर्विकल्प समाधि से उपलब्ध अद्भुत सिद्धियों द्वारा ही सन्तुष्ट होता है, क्योंकि समाधि से पवित्रता अवश्य आती है किन्तु जीवन में रूपान्तर नहीं होता और न ही चेतना का स्तर उत्कृष्ट होता है, गोरक्षनाथ का मानव जीवन के सामरस्य का आदर्श अत्यन्त सूचनात्मक, सर्वतोग्राही तथा समस्त जन-जीवन द्वारा स्वीकार करने योग्य है। सर्वकाल के तथा समस्त स्थानों के धार्मिक सम्प्रदायों का ध्येय गोरक्षनाथ का सामरस्य हो सकता है। प्रत्याहार, धारण, ध्यान तथा समाधि की व्याख्या जो योगी गोरक्षनाथ ने प्रस्तुत की है, यदि उस पर मानव चले तो व्यावहारिक तथा पारलौकिक जीवन की समस्त सीमाओं को लांघ कर शाश्वत चेतना में योगी स्थिर हो जाता है। गोरक्षनाथ की योग पद्धति में तथा अन्य योग पद्धतियों में मौलिक अन्तर यही है कि जब दूसरी योग पद्धतियों के अनुयायी पूर्ण कहलाते हैं तो केवल, इसी अर्थ में वे पूर्ण हैं कि उनका अन्तर जीवन पूर्ण हुआ किन्तु उनका बाह्य जीवन अपूर्ण ही रहता है। इसके विपरीत गोरक्षनाथ के मत का योगी जब सामरस्य को प्राप्त करता है, तब उसका बाह्य और अन्तर्मुखी जीवन उभयतः परिपूर्ण होता है। इस प्रकार के योगी का न केवल वैयक्तिक जीवन अभेद से पूर्ण है अपितु समस्त विश्व के सम्बन्ध में इस प्रकार का योगी बाह्य और आन्तरिक औद या समरसता को प्राप्त होता है। अतः सामरस्य को प्राप्त हुआ योगी पूर्ण योगी कहलाता है। जब यह 'एक में अनेक' और 'अनेक में एक' की भावना और अनुभव जन जीवन में व्याप्त हो जायेगा तब ही इस पतनशील विश्व का उद्धार होगा गोरक्षनाथ ने व्यष्टि में समष्टि की भावना द्वारा जन जीवन को ललकारा है। इस विचारधारा की आज के युग में बहुत उपादेयता है, जब कि मानव मोह और अज्ञान के अन्धकार में डूबा हुआ है। आज के पतित मानव को उन्नतिशील बनाने में गुरु गोरक्षनाथ प्रभृति महान योगियों की विचारधाराएँ ही सहायक हो सकती हैं।
गोरक्षनाथ जी ने शिव और शक्ति की भक्ति और पूजा का लोक में प्रचार करके सामरस्य के लोकोत्तर आदर्श को सर्वग्राही बना दिया है। सामरस्य तत्व की साकार मूर्ति शिवजी हैं। वे महायोगेश्वर हैं, वे परमशिव सनातन हैं, वे जगत से परे हैं, वे अपने आद्य अस्तित्व के परात्पर आनन्द को अपने ही भीतर सदा पाते हैं तथा अपनी शिव शक्ति के द्वारा उत्पन्न किये गये अनन्त विश्व जगत के उच्चारण, नामरूपात्मक पदार्थों में अपनी अनंत महिमा और परमानन्द को, शिव आदि नामरूपों के द्वारा प्रकट करते हैं। उनकी निज शक्ति उनकी सनातन, दिव्य सहचरी है। उनका उस परा शक्ति से अविभाज्य और अखण्ड सम्बन्ध है तथा विविध रीतियों से यह पराशक्ति अपने प्रभु तथा स्वामी की परिचर्या करती है। यद्यपि परम शिव, पराशक्ति के जगत में प्रकट होते हुए भी इन नामरूपात्मक अनन्त विलपनों के प्रति निरपेक्ष तथा तटस्थ रहते हैं इस प्रकार परा शक्ति सक्रिय, सनातन भगवती मां है और परम् शिव जगत के निरपेक्ष, निःस्वार्थ तथा अनासक्त पिता हैं। शिव और शक्ति न केवल एक हैं अपितु हमेशा युक्त हैं। शिव शाश्वत सन्यासी तथा महायोगी है, और एक आदर्श गृहस्थ भी हैं। सन्यास और गृहस्थ के सामरस्य का यह आदर्श व्यावहारिक है अर्थात अखण्ड और साकार शिव शक्ति की पूजा का आदर्श भक्ति के द्वारा साध्य जगत के सम्मुख, गोरक्षनाथ जी ने इसलिये रखा है, ताकि लोकोत्तर सामरस्य का मार्ग सब के लिये सुलभ हो और साकार शिव शक्ति की पूजा द्वारा इसी समय तथा इसी जीवन में प्रेरणा पाकर जन जीवन सामरस्य मार्ग के अनुगामी बन सके। इस प्रकार महायोगी गोरक्षनाथ और उनके ज्ञानी शिष्य वर्ग ने एक सार्वजनिक धर्म का आदर्श और दृष्टान्त जनता के सामने रखा है, जो आधुनिक जगत के समस्त धार्मिक मतभेदों को दूर कर सकता है और बाह्य जगत के वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन में फैले हुए सब प्रकार के विरोधों को सामरस्य के आध्यात्मिक आदर्श द्वारा, एकता और समन्वय का उपदेश देकर इस पारम्परिक भेद को मिटा सकता है। सामरस्य का यह दिव्य आदर्श सब रोगों को दूर करने में विश्वौषधि है। भारत का यह शाश्वत सन्देश प्राचीन और अर्वाचीन जगत के लिये परमोपकारक है।
इस प्रकार गोरक्षनाथ जिनकी सिद्धि दरिद्र कुटियों से राजमहलों तक अभाव गति थी, जिनका समाज में न पद यश, जो केवल एक व्यक्ति थें, केवल योगी थे आज के युग में एक अत्यन्त, प्रतिभाशाली, जागरूक पथ प्रदर्शक के रूप में दृष्टिगोचर होते है। उनका दर्शन प्राचीन होने पर भी वर्तमान युग में विश्व दर्शन माना जा सकता है। गोरक्षनाथ को समस्त विश्व के एक प्रमुख दार्शनिक के नाम से अभिहित किया जा सकता है।