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गोरक्षपीठाधीश्वर, श्री गोरक्षपीठ

योगिराज गम्भीरनाथ:-

आधुनिक युग में गोरखनाथ मन्दिर (गोरखपुर) की योगपरम्परा की श्रीवृद्धि में योगिराज बाबा गम्भीरनाथजी तथा महन्त दिग्विजयनाथजी महाराज की महत्ता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बाबा गम्भीरनाथजी महामहिम योगी थे जिनके सम्बन्ध में महात्मा विजय कृष्ण गोस्वामी का कथन है कि बाबा साक्षात् प्रेमस्वरूप हैं, ऐसे योगी के दर्शन भारत में इस समय दुर्लभ हैं। बाबा में सृष्टि, स्थिति और प्रलय की शक्ति है।

योगिराज गम्भीरनाथजी सिद्ध पुरुष थे। उन्होंने हठयोग, राजयोग और लययोग के क्षेत्र में सिद्धि प्राप्त की थी। नाथयोग-परम्परा में इधर सात-आठ वर्षों में उनके ऐसे योगी का दर्शन नहीं हुआ था। वे योगेश्वर गोरखनाथजी और महर्षि पतंजलि के समन्वय-संस्करण थे, बड़े-बड़े संतों और महात्माओं ने उनके चरणों में अपनी श्रद्धा समर्पित कर आत्ममोक्ष का विधान प्राप्त किया। उनका जन्म विक्रमीय उन्नीसवीं शती के चौथे चरण में कश्मीर प्रदेश में एक गाँव के समृद्ध परिवार में हुआ था। पूर्वाश्रम के सम्बन्ध में पूछने पर वे कहा करते थे कि प्रपंच से क्या होगा? युवावस्था में उन्हें एक दिन सूचना मिली कि गाँव में एक योगी श्मशान में ठहरे हैं। वे मिलने गये। योगी ने कहा कि तुम गोरखपुर जाकर गोरखनाथ-मठ के महन्त बाबा गोपालनाथजी महाराज से दीक्षा लो। वे नाथसम्प्रदाय के योगी थे। उनके आदेश से वे गोरखपुर के लिए चल पड़े। उन्होंने अपने-आप को महन्त गोपालनाथजी के चरणों में समर्पित कर दिया। गोपालनाथजी महाराज ने उनकी शान्त गम्भीर मुख मुद्रा से प्रसन्न होकर योग-दीक्षा दी और गम्भीरनाथ नाम प्रदान किया। वे योगसाधना के लिए पैदल यात्रा करते हुए काशी गये। वहाँ एक निर्जन स्थान में रह कर उन्होंने योगाभ्यास किया। उसके बाद प्रयाग में गंगा के तट पर झूँसी की एक गुफा में निवास कर वे तप करने लगे। उन्होंने कैलास, मानसरोवर, अमरनाथ, द्वारका, गंगासागर तथा रामेश्वरम् आदि तीर्थों की परिक्रमा चार साल में पूरी की और अमरकंटक पर अधिक समय तक रह गये। गम्भीरनाथजी जब नर्मदा की परिक्रमा कर रहे थे, उनका मन एक नदीतटीय रमणीय स्थान में लग गया। यहाँ एक कुटी थी उन्होंने उसमें निवास किया। पहले दिन एक बहुत बड़ा साँप दीख पड़ा दूसरे और तीसरे दिन भी दीख पड़ा। तीसरे दिन उस कुटी में रहने वाले ब्रह्मचारी ने जो कई दिनों से बाहर था, यह घटना सुनकर कहा कि मैं इसी कुटी में 12 साल से निवास करता हूँ आपने जो एक सर्प देखा है, वह एक महात्मा का रूप है जो इसी वेश में यहाँ निवास करते हैं। आपका तपोबल स्तुत्य है कि आपको उनका दर्शन हो गया। 1937 वि. में योगी गोपालनाथ के शिवधाम प्राप्त करने का समाचार पाकर वे गोरखपुर आये और महन्त बलभद्रनाथ के कहने पर कुछ दिनों तक गोरखपुर मठ में ठहरने के बाद बिहार प्रदेश में गया जनपद के कपिलधारा स्थान में जाकर तप करने लगे। महात्मा विजयकृष्ण गोस्वामी गम्भीरनाथजी के चरणों में बड़ी श्रद्धा रखते थे। जिन दिनों गम्भीरनाथजी कपिलधारा पहाड़ी पर तप करते थे, उन्हीं दिनों विजयकृष्ण गोस्वामी आकाशगंगा पहाड़ी पर तप करने में तत्पर थे। वे कभी-कभी योगिराज गम्भीरनाथजी का दर्शन करने कपिलधारा आया करते थे। कपिलधारा में तप करने के बाद गम्भीरनाथ जी गोरखनाथ-मन्दिर में निवास कर शांतिपूर्वक जीवनमुक्त अवस्था में रहने लगे। गोरखनाथ मठ में आगमन के बाद लोग उन्हें ‘बूढ़े महाराज’ के विशेषण से समलंकृत कर उनके प्रति श्रद्धा और आदर प्रकट करते थे। गोरखपुर के गोरखनाथ मठ में निवास-काल में उन्होंने अपनी योगसिद्धि से एक बार महान चमत्कार उपस्थित किया। एक धनी परिवार की विधवा ने योगिराज के चरणदेश में निवेदन किया, ‘‘मेरा पुत्र बैरिस्टरी का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के लिए लन्दन में अध्ययन कर रहा है। उसके मित्र का तार आया है कि वह लन्दन में नहीं है, वह मेरा इकलौता लड़का है’’ विधवा रोने लगी। योगिराज ने उससे बाहर प्रतीक्षा करने को कहा और स्वयं एक कोठरी में चले गये। बाहर से दरवाजा बन्द कर लिया। आधे घण्टे बाद बाहर आकर उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि उसका लड़का अच्छी तरह है, वह सोमवार को गोरखपुर पहुँच जायेगा। अगले बुधवार को एक नौजवान गोरखपुर के एक संभ्रांत नागरिक के साथ गोरखनाथ मंदिर आया। वे राजकीय विद्यालय के आचार्य राय साहब अघोरनाथ थे और उन्हीं की उपस्थिति में यह घटना बुधवार को घटित हुयी थी। नौजवान बाबा को देखते ही चकित रह गया और कहा, ‘‘आप कब आ गये?’’ उसने बताया कि उसके जहाज को बम्बई पहुँचने में तीन दिन शेष रह गये थे। उसके केबिन के सामने वही बाबा जी खड़े थे। उसने केबिन के बाहर आकर उनसे 5 मिनट तक बात की। इसके बाद बाबा जी चले गये। फिर न तो उसने इनको जहाज पर देखा और न बम्बई से गोरखपुर आते समय रेलगाड़ी में देखा। उपर्युक्त घटना ठीक उस समय की थी, जब बाबा कोठरी में चले गये थे। योगिराज मुस्कुरा रहे थे और उसकी बातें बड़ी शान्ति से सुन रहे थे। इस तरह बाबा गम्भीरनाथ जी की साधना, न जाने कितने यौगिक चमत्कारों और सिद्धियों से भरी है। उन्होंने नाथ योग के सिद्धान्त के अनुसार शिव और शक्ति की एकात्मकता-कुण्डलिनी के पूर्ण जागरण के योग-माध्यम से अनुभव किया। वे अपने को सदा योगेश्वर गोरखनाथजी का अनुयायी बताया करते थे। उन्होंने सदा कान में कुण्डल और वक्ष पर नाद धारण किया। वैराग्य उनकी साधना का प्राण था। नाम-जप में उनकी बड़ी निष्ठा थी। महात्मा विजयकृष्ण गोस्वामी की उक्ति है कि उन्हें भगवन्नाम-निष्ठा बाबा गम्भीरनाथजी की कृपा से प्राप्त हुई। योगिराज गम्भीरनाथजी की श्रीमद्भगवद्गीता में अप्रतिम श्रद्धा थीं। उनकी मार्मिक वाणी है कि सदा सत्य बोलना चाहिए, छल-प्रपंच से दूर रहना चाहिये। अहम में नहीं चिपकना चाहिये। समस्त धर्मों और मत-मतान्तरों का आदर करना चाहिये। योगिराज गम्भीरनाथजी ने सम्वत् 1975 वि. चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को सवा नौ बजे प्रातः परमधाम की यात्रा की। गोरखनाथ-मन्दिर (गोरखपुर) के दिव्य शान्तिमय-पवित्र प्रांगण में ही उनका समाधि-मन्दिर है जो शाश्वत सत्य और शान्ति का दिव्य प्रतीक है, उसमें उनकी प्रतिमा प्रतिष्ठित है। नित्य नियमपूर्वक उनकी प्रतिमा की पूजा-आरती होती है।