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मकर संक्रान्ति पर्व (गोरखपुर का खिचड़ी मेला)

भारत की गौरवशाली धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्परा में प्राचीन काल से व्रतों, पर्वों, त्यौहारों का विशेष महत्त्व रहा है। इसीलिये चाहे ज्ञान की अनादि परम्परा के आदर से जुड़ा ऋषि तर्पण का पर्व रक्षाबन्धन हो, चाहे असत् पर सत् या अधर्म पर धर्म की निश्चित विजय का सन्देशवाहक जयन्त अभिमान का पर्व विजयादशमी हो, चाहे तमस से प्रकाश की ओर यात्रा का ज्योतिर्मय पर्व दीपावली हो, चाहे उन्मुक्त मन की उमंग और तरंग से रंगारंग सामाजिक समता और विकारमोचन का त्योहार होली हो। हमारे राष्ट्रीय और जातीय जीवन में अनास्था, शोक और संत्रास का नहीं वरन् आस्था, विश्वास और उल्लास का ही बोलबाला रहा है।

व्रतों और पर्वों की हमारी लम्बी वैविध्यपूर्ण परम्परा में मकर संक्रान्ति का भी विशिष्ट महत्त्व और स्थान है। इस भौतिक जगत् के एक महान सत्य का संकेत करते हुए ऋग्वेदीय ऋषि कहते हैं कि सूर्य ही इस दृश्यमान और जंगम जगत् की आत्मा है। ज्योतिर्विदों के अनुसार सूर्य के प्रतीयमान आकाश मार्ग को कान्तिवृत्त कहा जाता है जो मेष, वृष, मिथुन आदि 12 राशियों के रूप में 12 समान भागों में विभक्त है। जगत् की आत्मा सूर्य वर्षपर्यन्त क्रमशः इन्हीं 12 राशियों में संक्रमण करता रहता है। एक अधिकृत राशि से दूसरी राशि में सूर्य के प्रवेश का ही नाम संक्रान्ति है। अस्तु इस प्रकार क्रमशः सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तब मकर संक्रान्ति का पर्व आता है। अतः संक्रान्ति का पर्व मूलतः जगत् पिता सूर्य की उपासना का ही महापर्व है। वर्ष में दो अयन उत्तरायण और दक्षिणायन होते हैं। मकर राशि में जब सूर्य की संक्रान्ति होती है तब से मिथुन राशि तक 6 मास पर्यन्त सूर्य उत्तरायण रहता है। यह काल कई प्रकार के धार्मिक संस्कारों और अनुष्ठानों के लिये शुभ और प्रशस्त माना जाता है। सूर्य के उत्तरायण होने के दिन से ही रातें छोटी और दिन बड़ा होने लगता है।

माघ मास में सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तब इस पुण्यकाल में स्नान-दान का विशेष महत्त्व है। देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों एवं अनुष्ठानों के साथ यह पर्व बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में जहाँ प्रायः इसे खिचड़ी अर्थात् चावल व दाल के मिश्रण के दान एवं भोजन से सम्बन्धित संक्रान्ति कहते हैं, वहीं महाराष्ट्र में इस अवसर पर तिल और गुड़ का विशेष प्रयोग होता है। उधर बंगाल में इसे तिलवा संक्रान्ति कहते हैं, जबकि दक्षिण भारत में इस अवसर पर तीन दिनों तक चलने वाला महोत्सव पोंगल के नाम से प्रसिद्ध है।

धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस दिन संक्रान्ति हो उस दिन संकल्पपूर्वक वेदी या चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर अक्षतों का अष्टदल बनाना और उसमें स्वर्णमय सूर्य भगवान की मूर्ति स्थापित कर उनका पंचोपचार विधि से पूजन करना चाहिये। इस दिन गंगा स्नान, दाल, चावल और काले तिल का दान बड़ा पुण्य प्रदायी कहा गया है। शास्त्रों में मकर संक्रान्ति में काष्ठ और वस्त्र के विशेष दान का भी विधान वर्णित है। कदाचित ठंड अधिक होने के कारण इसका दान महत्त्वपूर्ण माना गया है जिससे कि गरीबों को भी ठंड से बचने के लिये आवश्यक काष्ठ और वस्त्र प्राप्त हो सके। संक्रान्ति काल के दिन समुद्र, गंगासागर, काशी और तीर्थराज प्रयाग में स्नान का विशेष महत्त्व है। किन्तु जो इन तीर्थों मे किसी कारण से नहीं जा सकते हैं उन्हें गंगा आदि सात पवित्र नदियों का स्मरण कर किसी भी नद, नदी या सरोवर में विधिवत स्नान करने का विधान किया है जिससे व्रती को तीर्थस्नान का फल तथा सूर्यलोक की प्राप्ति होती है।

मकर संक्रान्ति का जहाँ कई धार्मिक अनुष्ठानों के कारण तथा लोकपरलोक में उत्तम गति देने वाला होने के कारण भी विशेष महत्त्व है और प्रायः सारे देश में यह बड़े उत्साह और श्रद्धा-विश्वास के साथ मनाया जाता है, वहीं इस पुण्य पर्व का शिवावतार महायोगी गोरक्षनाथ जी और गोरखपुर से भी विशेष महत्त्व है। इस सम्बन्ध में ज्ञात इतिहास के अनुसार त्रेता युग में कभी महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी भ्रमण करते हुए कांगड़ा जिले के ज्वाला देवी के स्थान पर पहुँचे। महायोगी को आया देखकर स्वयं देवी प्रकट हुईं और उनका स्वागत करते हुये उन्होंने उनसे धाम में ही भिक्षाग्रहण करने का आमंत्रण दिया। देवी के स्थान में वामाचार विधि से पूर्जा-अर्चा होने के कारण मद्य-मांस युक्त तामसी भोजन गोरक्षनाथ जी ग्रहण नहीं करना चाहते थे। इसलिये उन्होंने देवी से प्रार्थना की कि मैं खिचड़ी खाता हूँ और वह भी मधुकरी द्वारा प्राप्त करके। देवी ने कहा कि ठीक है मैं खिचड़ी पकाने के लिये अदहन गरम करा रही हूँ तुम खिचड़ी माँग कर ले आओ। कहते हैं वहाँ से गोरक्षनाथ जी भिक्षा में खिचड़ी माँगते हुए अयोध्या की इस प्रान्त भूमि में, जो अब गोरखनाथ जी के नाम से ही गोरखपुर कहलाता है, आ गये। शान्त और एकान्त स्थान देखकर हिमालय की तलहटी की इस पुण्य भूमि में महायोगी समाधिस्थ हो गये। खिचड़ी के लिये रखा गया उनका खप्पर श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों द्वारा खिचड़ी चढ़ाये जाते रहने के बाद भी न भरा न ही वे लौट कर कांगड़ा, जहाँ ज्वाला देवी के प्रभाव से जल खौल रहा है वापस गये। महायोगी गोरक्षनाथ जी के उसी अक्षय पात्र में तब से लोग खिचड़ी चढ़ाते चले आ रहे हैं। श्रद्धा और भक्ति तथा उत्तरवर्ती नाथ सन्तों की लोकप्रियता के कारण धीरे-धीरे संक्रान्ति के पर्व पर यहाँ श्री नाथ जी के मन्दिर में भारी संख्या में लोगों के आने के साथ-साथ कई दिनों तक चलने वाले उत्तरोत्तर वर्तमान मेले का भी आयोजन विगत कई सौ वर्षों से होता चला आ रहा है जिसमें लाखों लोग जुटते हैं। महायोगी गोरक्षनाथ जी का कृतित्व और व्यक्तित्व युगान्तरकारी था। उनके शान्त और दान्त आध्यात्मिक प्रभाव से जहाँ योग साधना में सदाचार, संयम और नैतिकता का पुनः प्रभाव बढ़ा वहीं सभी जातियों और वर्णों के लिये योग साधना सुलभ हो गयी। सामाजिक और सांस्कृतिक एकता के ऐसे उन्नायक ध्वजवाही सन्त गुरु गोरक्षनाथ जी और उनके अनुयायी सन्तों के लोक संग्रही कार्यों के कारण जहाँ सारे देश में गोरक्षनाथ जी और अन्य नाथ सिद्धों से सम्बन्धित मठ-मन्दिर और धूने बने, वहीं विभिन्न काल खण्डों में अमर काय अयोनिज महायोगी गोरक्षनाथ जी के प्राकट्य और प्रभाव का भी वर्णन इतिहास ग्रन्थों में देखने को मिलता है। पड़ोस के हिन्दू राष्ट्र नेपाल का शाह राजवंश गोरक्षनाथ जी के आशीर्वाद से ही अस्तित्व में आया। इसके संस्थापक राजा पृथ्वीनारायण शाह गुरु गोरक्षनाथ जी के आशीर्वाद से ही बाइसी और चौबीसी के नाम से विभक्त 46 छोटी-छोटी रियासतों का एकीकरण कर वर्तमान राष्ट्र का निर्माण करने मे समर्थ हुए। श्री नाथ जी की इसी कृपा की स्मृति में नेपाल में राजमुद्रा में और राजमुकुट में गोरक्षनाथ जी का नाम और उनकी चरण पादुका अंकित रहती है। आठवीं शताब्दी में मेवाड़ में एक महान राजवंश की स्थापना करने वाले वीर बप्पा रावल को वरदानी खड्ग प्रदान कर महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी ने अकल्पनीय विजयश्री दिलायी थी। वीर विक्रमादित्य के बड़े भाई भर्तृहरि को योग दीक्षा देकर महायोगी बनाने का श्रेय भी गुरु गोरक्षनाथ जी को ही है। बंगाल की रानी मैनावती और राजा गोपीचन्द को भी योग दीक्षा देकर यश प्रदान करने का श्रेय गोरक्षनाथ जी को है।

गोरखनाथ जी का प्रभाव केवल भारत ही नहीं पार्श्ववर्ती वर्मा, सिंहल, तिब्बत, चीन, मंगोलिया और बृहत्तर भारत के कई देशों में फैला है। ऐसे महायोगी गोरखनाथ जी जब यहाँ आये तो उनकी साधना वर्तमान गोरखनाथ मन्दिर की महिमा अपने आप बढ़ गयी। महायोगी की चमत्कारी सिद्धियों और उनकी कृपालुता से प्रभावित लोगों ने जब यहाँ आना प्रारम्भ किया तो धीरे-धीरे कालान्तर में इस स्थान को केन्द्र बना कर बस्तियों का निर्माण प्रारम्भ हुआ जो बढ़ते-बढ़ते वर्तमान में गोरखपुर नगर और जनपद के रूप में विद्यमान है।

मकर संक्रान्ति के अवसर पर प्राचीन काल से ही यहाँ प्रति वर्ष श्रद्धालुओं का मेला लगता है। भीम सरोवर में स्नान और नाथ जी का दर्शन करने आये लाखों लोग मन्दिर में इस अवसर पर खिचड़ी चढ़ाते हैं और अपनी मनोकामना पूर्ण करते हैं। यद्यपि यह मेला कब से प्रारम्भ हुआ यह बताना सम्भव नहीं है तथापि ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर युगपुरुष महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के समय में जहाँ गोरखनाथ मन्दिर और इसका परिसर राष्ट्र की सीमाओं को लांघ कर अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का महत्त्वपूर्ण स्थान बना वहीं प्रायः मास पर्यन्त चलने वाला खिचड़ी का मेला भी दूर-दूर तक विख्यात हो चुका है। शक्तिपीठ देवीपाटन को छोड़ कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में इससे बड़ा कोई धर्मिक मेला नहीं लगता है।

मकर संक्रान्ति के दिन आने वाले दर्शनार्थियों की सुविधा को देखते हुए मन्दिर प्रशासन तथा स्वयं सेवी संस्थाओं की ओर से पूरी व्यवस्था की जाती है। उत्तरी भारत के समस्त मन्दिरों में श्री गोरखनाथ मन्दिर का विशिष्ट स्थान है। मन्दिर में महायोगी गुरु गोरक्षनाथ जी द्वारा जलाई गयी अखण्ड ज्योति त्रेता युग से आज तक अनवरत अनेक झंझावतों एवं प्रलयकारी आपत्तियों के थपेड़े खाकर भी अखण्ड रूप से जलती जा रही है। मन्दिर के अन्तवर्ती भाग में कुछ देव मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। मन्दिर के दक्षिण द्वार के पूर्व में भगवान शिव नटराज की भव्य मांगलिक मूर्ति प्रतिष्ठित है तथा पार्श्व भाग में भगवान गणेश जी की मूर्ति स्थापित है। इनको भारतीय संस्कृति में विघ्न विनाशक के रूप में तथा सांसारिक वैभव, शान्ति तथा भौतिक और आध्यात्मिक जीवन की सिद्धियों के दाता देवता माना जाता है। मन्दिर में पश्चिमोत्तर कोण में भगवान शिव के वक्षस्थल पर नृत्य करती हुई काली माता की मूर्ति है। इन्हें ही महामाया काली कहते हैं। मन्दिर की उत्तर दिशा में काल भैरव जी की मूर्ति स्थापित है उन्हें भगवान शंकर का कोतवाल और द्वारपाल के रूप में पूजा जाता है। इसके अतिरिक्त माता शीतला, त्रिशूल भैरव, भगवान शंकर, माता दुर्गा तथा श्रीराम के दूत महाबली हनुमान जी और राध-कृष्ण के मन्दिर भी दर्शनीय हैं। मन्दिर के पास में ही महायोगी श्री गोरक्षनाथ जी द्वारा प्रज्वलित अखण्ड धूना निरन्तर प्रज्वलित है। इसके अलावा मन्दिर के प्रांगण में सरोवर के सन्निकट महाबली भीमसेन का मन्दिर और साथ ही महन्त बाबा ब्रह्मनाथ जी, योगिराज गम्भीरनाथ जी, युगपुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज, राष्ट्रसन्त ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ की समाधि मन्दिर तथा साथ ही मन्दिर परिसर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की स्मृति में बना विशाल भवन है जो निश्चित ही अनोखा व दर्शनीय है जिसमें हमारे सभी आराध्य देवी-देवताओं, महर्षियों और महापुरुषों की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं। इनके अतिरिक्त नवग्रह मन्दिर, भगवान श्रीराम का मन्दिर, विष्णु भगवान, माता संतोषी, बाल देवी, हट्ठी माता के मन्दिरों के साथ-साथ विशाल यज्ञशाला भी मन्दिर प्रांगण में ही स्थित है। साधना की दृष्टि से यहाँ आने वाले साधकों के लिये यहाँ जहाँ साधना भवन, आगन्तुक सन्त महात्माओं के लिये सन्त निवास, योगाभ्यास के इच्छुक लोगों के लिये योग प्रशिक्षण केन्द्र, आधुनिक उपकरणों के माध्यम से शारीरिक व्यायाम के लिये हैल्थ सेन्टर स्थापित हैं वहीं यात्रियों की सुविधा के लिये सुसज्जित धर्मशाला और यात्री-निवास भी हैं। परिसर में ही एक आधुनिक चिकित्सा सुविधा से युक्त 300 विस्तर का धर्मार्थ चिकित्सालय तथा दातव्य औषधालय, देववाणी संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन के लिये संस्कृत महाविद्यालय भी है। श्री गोरखनाथ मन्दिर के परिसर में ही हिन्दू धर्म, दर्शन, योग तथा राष्ट्रीयता से सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन के लिये जहाँ विशाल पुस्तकालय बना है वहीं श्री गोरक्षनाथ शोध् संस्थान भी स्थापित है। योग के प्रचार-प्रसार के लिये मन्दिर से विशेष रूप से योग साहित्य और एक मासिक पत्रिका योगवाणी का भी प्रकाशन किया जाता है। इस प्रकार योग, धर्म, अध्यात्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता और सामाजिक समरसता के प्रचार-प्रसार में अधिकाधिक समर्पित श्री गोरखनाथ मन्दिर आज भारत के धर्म काश में अपनी निष्ठा, स्वच्छता और सुव्यवस्था के लिये कीर्तित होता हुआ लोक-संग्रह के कार्य में लगा हुआ है।