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युग-पुरुष महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज

इस घटना से समस्त प्रशासकीय अधिकारी अप्रसन्न हो गये। उस समय स्थानीय कमिश्नर, कलेक्टर और एस.पी. सब के सब ईसाई धर्मावलंबी थे। उन्होंने मुकदमा चलाना चाहा, किन्तु नगर के कुछ प्रतिष्ठित सज्जनों के हस्तक्षेप के कारण यह कार्यवाही रुक गई।

राजनैतिक गतिविधियों से सम्पर्कः-

राणा नान्हू सिंह का विद्यार्थी जीवन भारतीय पराधीनता का कठोरतम समय था। अंग्रेजी शासन की कठोरता और दमन की दुर्दमनीयता के कारण साधारण जनता में नौकरशाही के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस न था। तथापि उस अवस्था में भी राष्ट्र से प्रेम रखने वाले लोगों की कमी न थी। विदेशी शासन सत्ता को उन्मूलित करके राष्ट्र को स्वाधीन बनाने का प्रयास करने वाले इन राष्ट्रभक्तों के दो वर्ग थे। एक वर्ग ऐसे लोगों का था, जो प्रत्यक्ष रूप से जनता के मध्य जागरण का संदेश देता रहता था। सरकारी अधिकारियों से मिलकर जनता के कष्टों को दूर करने का प्रयास करता था और आवश्यकता पड़ने पर सत्याग्रह आदि का भी सहारा लेता था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आदि से संबंधित लोग इसी वर्ग के थे।

दूसरे वर्ग में वे लोग थे, जो सरकारी कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करते थे। सरकारी खजानों को लूटते, नौकरशाही के विभिन्न शिकंजों को तोड़कर जनशक्ति के बल पर विदेशी शासन सत्ता को दहला देने का प्रयास करते थे। ऐसे लोग गुप्त संगठनों के माध्यम से कार्य करते हुए स्वाधीनता प्राप्ति के लिए एक युगान्तरकारी क्रांति का बीजारोपण कर रहे थे।

राणा नान्हू सिंह ने विद्यार्थी जीवन में दोनो वर्गो से संबंध स्थापित किया। उनके हृदय में हिन्दू धर्म, हिन्दू जाति, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू राष्ट्र के प्रति संस्कारतः अंकुरित उत्कट प्रेम और बलिदान की भावना उन्हें एक सही दिशा प्रदान करने के लिए जागरूक थी। उस काल में ही उन्होंने अनेक क्रांतिकारियों से भी संपर्क स्थापित किया था, जो यथा अवसर मन्दिर पर भी आया करते थे।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में भारतीय जनता की भावनाओं का नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथों में आ गया था। कांग्रेस में भी दो प्रकार के लोग थे। एक उग्रवादी, जो प्रत्यक्ष ध्वन्सात्मक कार्यवाही में विश्वास करते थे। दूसरे समझौतावादी, जो अपने नम्र विचारों के कारण ‘नरम दल’’ के नाम से सम्बोधित किये जाते थे। उस समय कांग्रेस का नेतृत्व महात्मा गाँधी जैसे नरम दलीय नेता के हाथों में आ रहा था।

सन् 1920 में महात्मा गाँधी का गोरखपुर में भव्य स्वागत हुआ। महात्मा गाँधी ने एक विशाल जनसमूह को सम्बोधित किया। राणा नान्हू सिंह ने गाँधी जी के कार्यक्रम की निर्विघ्न समाप्ति के लिए ‘वालेन्टियर कोर’ का संगठन किया था और गाँधी जी के कार्यों को पूरा करने में तन-मन-धन से सहयोग किया। किन्तु थोड़े दिनों के पश्चात् चौरीचौरा की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि राणा नान्हू सिंह (पूज्य महंत दिग्विजयनाथजी) महात्मा गाँधी के समझौतावादी सिद्धांतों के पोषक न थे। सन् 1921 में महात्मा गाँधी का राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन प्रारम्भ हुआ। राष्ट्र प्रेमी युवकों ने अपने अध्ययन- अध्यापन, नौकरी तथा व्यवसाय आदि का परित्याग कर असहयोग आंदोलन में भाग लिया। इस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से गोरखपुर, देवरिया जनपद में कांग्रेस का संगठन अत्यंत शक्तिहीन था। राणा नान्हू सिंह ने इन आंदोलनों से प्रभावित होकर सन् 1920 ई0 में ही कालेज का परित्याग कर दिया था। उन्होंने असहयोग आंदोलन को सफल बनाने का पूरा प्रयास किया।

गोरखपुर जिले में स्थित चौरीचौरा स्थान पर आंदालेन के खिलाफ की जो प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई, उससे नौकरशाही तो आतंकित हुई ही, महात्मा गाँधी के अहिंसात्मक आंदोलन का रूप ही बदल गया। उन्हें बहुत शीघ्र ही अपना आंदोलन वापस लेना पड़ा। इस चौरीचौरा काण्ड के अभियुक्तों को फांसी की सजा देने का निर्णय किया गया था। उनमें राणा नान्हू सिंह भी थे। किन्तु साक्ष्य न होने के कारण वे मुक्त कर दिये गये।