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राष्ट्र सन्त महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज

इसी कालखण्ड में भारत विभाजन की माँग जोर पकड़ती जा रही थी। मुस्लिम लीग के नेतृत्व में देशभर में साम्प्रदायिक दंगों की आग सुलग रही थी। जगह-जगह हिन्दुओं पर संगठित साम्प्रदायिक आक्रमण आरम्भ हो चुके थे। ऐसे में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के नेतृत्व में हिन्दू महासभा उत्तर भारत में भारत विभाजन के तीव्र विरोध के साथ-साथ हिन्दू समाज को संगठित करने के भगीरथ प्रयास में लगी हुई थी। अवेद्यनाथ जी महाराज द्वारा गोरक्षनाथ मन्दिर की व्यवस्था संभाल लेने से महन्त दिग्विजयनाथ जी को सामाजिक-राष्ट्रीय आन्दोलन हेतु पर्याप्त अवसर उपलब्ध हुए।

खण्डित भारत की स्वतंत्रता, इस्लामी आतंक, साम्प्रदायिक दंगे और भीषणतम नरसंहारों के साये में प्राप्त हुई। अभी इसकी आग बुझी नहीं कि 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या हो गयी। महन्त दिग्विजयनाथ जी की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से घबड़ाई सरकार को बहाना मिल गया और षड्यन्त्रपूर्वक महन्त जी को महात्मा गाँधी की हत्या के तथाकथित षड्यन्त्र में गिरफ्तार कर उन्नीस महीने जेल में बन्द कर दिया गया तथा गोरक्षनाथ मंदिर की समस्त चल-अचल सम्पत्ति जब्त कर ली गयी। उस दौरान अवेद्यनाथ जी महाराज ने नेपाल में रहकर गोपनीय ढंग से गोरक्षनाथ मन्दिर की व्यवस्था एवं महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज को निर्दोष सिद्ध करने हेतु सफल प्रयास किया। गाँधी हत्या के समय की एक घटना का जिक्र करते हुए महन्त अवेद्यनाथ ने बताया, ‘‘नेपाल में रहकर मैं गोरक्षनाथ मन्दिर एवं महन्त जी के मुकदमे की पैरवी कर रहा था कि लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र ‘नवजीवन’ ने यह दुष्प्रचारित कर दिया कि महात्मा गाँधी की हत्या महन्त जी की रिवाल्वर से की गयी। यह तथ्य भी मुकदमे में जुड़ गया। तब मैंने गोरखपुर के जिलाधिकारी से सम्पर्क कर यह स्पष्ट किया कि महन्त जी के रिवाल्वर की जाँच कर सकते हैं। जिलाधिकारी ने आकर स्वयं जाँच की।’’ और फिर महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज ने हँसते हुए बताया कि जेल से छूटने के बाद महन्त जी ने ‘नवजीवन’ अखबार के मालिकानों को क्षमा कर दिया।

स्वातन्त्र्योत्तर भारत में हिन्दू समाज की एकता का प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो चुका था। जन्मना जाति व्यवस्था के श्रेष्ठतावाद एवं अस्पृश्यता जैसी विकृतियों से हिन्दू समाज के खण्डित तथा कमजोर होने की संभावनाएँ प्रबल होती जा रही थीं। भारतीय शासन विकृत धर्मनिरपेक्षता तथा वोट बैंक की राजनीति के अन्तर्गत अंग्रेजों की ‘बाँटो और राज करो’ की नीति का ही अनुगामी बना हुआ था। महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने सामाजिक-शैक्षिक पुनर्जागरण के साथ-साथ राजनीतिक मंच पर हिन्दू समाज की सिंह गर्जना का अभियान आरम्भ किया और उनके उत्तराधिकारी महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज उनके सक्रिय सहयोगी एवं अनुगामी बने।

राजनीति में महन्त अवेद्यनाथ

धर्म की रक्षा के लिए राजनीति महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज को अपने गुरुदेव से विरासत में प्राप्त हुई। महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के साथ-साथ ही शिष्य रूप में ही महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज राजनीतिक मंच पर भी सक्रिय हो चुके थे। 1962 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में मानीराम विधानसभा से विजयी होकर महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज पहली बार विधानसभा के सदस्य बने और लगातार 1977 ई. तक के विधानसभा चुनाव तक मानीराम विधानसभा से चुनाव में विजयी होते रहे। 1980 ई. में मीनाक्षीपुरम् में हुए ‘धर्म परिवर्तन’ की घटना से विचलित महन्त जी राजनीति से संन्यास लेकर हिन्दू समाज की सामाजिक विषमता के विरुद्ध जन-जागरण के अभियान पर चल पड़े।

लोकसभा चुनाव में पहली बार महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर 1969 ई. के उपचुनाव में महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज को गोरखपुर की जनता ने ससम्मान संसद में भेज दिया। पुनः 1989 ई. में श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन जब अपने उत्कर्ष पर था, तथाकथित सेकुलर राजनीतिक दल यह चुनौती देने लगे कि इस आन्दोलन को जनता का समर्थन प्राप्त नहीं है। इन परिस्थितियों में अयोध्या में हुए धर्म संसद में महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज से लोकसभा चुनाव जीतकर सेकुलर दलों को जवाब देने का प्रस्ताव पास हुआ और महन्त जी हिन्दू महासभा से 1989 ई. के लोकसभा चुनाव में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मन्दिर निर्माण के मुद्दे पर सम्पूर्ण हिन्दू सन्त-महात्माओं के समर्थन से चुनावी जंग में कूदे और विजयी हुए। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाले जनता दल के गठबन्धन का प्रत्याशी भी चुनाव मैदान में था। तत्पश्चात् लोकसभा के 1991 के मध्यावधि चुनाव तथा 1996 के लोकसभा चुनाव में महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज विजयी होते रहे।