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राष्ट्र सन्त महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज

महन्त जी से जब उनके बचपन की स्मृतियों पर चर्चा की गयी तो अपने चिर-परिचित दिव्य मुस्कान के साथ वे बोल पड़े कि संन्यासी का बचपन नहीं होता। दीक्षा के साथ ही पिछले जीवन से उसका नाता टूट जाता है और वह नया जीवन प्राप्त करता है। किन्तु अनेक बार के आग्रह पर एक क्षण मौन के पश्चात् महन्त जी ने अपने बचपन की स्मृतियों में लौटते हुए बताया, ‘‘मुझे अपनी माँ का नाम याद नहीं है क्योंकि जब मैं बहुत छोटा था मेरे माता-पिता की अकाल मृत्यु हो गयी। मैं दादी की गोद में पल रहा था। उच्चतर माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा पूर्ण होते ही दादी का भी स्वर्गवास हो गया। परिणामतः मेरा मन इस संसार के प्रति उदासीन होता गया तथा वैराग्य का भाव मन में घर करता गया।’’

महन्त जी के अनुसार उन्हें इसी वैराग्य एवं विरक्ति की भावनानुभूति में गृहत्याग के साथ ऋषिकेश में संन्यासियों का साथ मिला। सत्संग से भारतीय धर्म-दर्शन में अध्ययन की रुचि विकसित हुई। उस समय वाराणसी भारतीय धर्म दर्शन के अध्ययन का प्रमुख केन्द्र था। उन्होंने काशी में संस्कृत भाषा के अध्ययन के साथ भारतीय धर्म-दर्शन एवं योग-दर्शन का अध्ययन एवं अनुशीलन किया।

महन्त जी से जब यह जानना चाहा कि गृह त्याग के बाद वे कितनी बार अपने पैतृक गाँव गये, महन्त जी का जवाब विस्मयकारी था। उनके इस प्रश्न के उत्तर में ही बाल्यावस्था से ही महन्त जी की निवृत्तिमार्गी प्रवृत्ति का पता चल जाता है। संन्यासी होने के बाद वे एक बार अपने पितृगृह गये। वह भी अपने नैतिक एवं धार्मिक कर्तव्यों की पूर्ति हेतु। महन्त जी ने बताया-‘‘मेरे पिताजी तीन भाई थे। मैं अपने पिताजी का इकलौता पुत्र था। गृहत्याग एवं संन्यास के दौरान एक बार मेरे एक चाचा ऋषिकेश आये थे। दूसरे चाचा के मन में यह भ्रम उत्पन्न हो गया कि मैं अपनी पूरी सम्पत्ति एक ही चाचा को न लिख दूँ। मुझे अपने हिस्से की पूरी पैतृक सम्पत्ति दोनों चाचा को बराबर देनी थी, अतः मैं इसी कार्य हेतु गया। न्यायालय में मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होकर मैंने अपनी पैतृक सम्पति दोनों चाचा के नाम बराबर-बराबर कर देने की अपनी संस्तुति दी तो मजिस्ट्रेट ने कहा कि आप अभी किशोर हैं, संन्यासी जीवन बड़ा कष्टमय होता है, कल पुनः गृहस्थ जीवन में लौटने की आपकी इच्छा हो सकती है, अतः अपनी सम्पत्ति देने से पूर्व एक बार और सोच लीजिए।’’ महन्त जी ने उस समय मजिस्ट्रेट को जो उत्तर दिया वह इस बात का स्पष्ट साक्ष्य है कि वे पूर्णतः संन्यासी स्वभाव प्राप्त कर चुके थे। उन्होंने कहा- ‘‘मैं अतिशीघ्र इस सम्पत्ति से छुटकारा पाना चाहता हूँ ताकि संन्यास जीवन से विमुख होने की सम्भावना ही शेष न रहे।’’ महन्त जी के दृढ़ निश्चय एवं तेजस्वी मुखमण्डल की चमत्कृत आभा से निरुत्तर मजिस्ट्रेट ने इनकी सम्पत्ति दोनों चाचा के नाम स्थानान्तरित कर दी। इस प्रकार संन्यासी जीवन से पूर्व के अपने जीवन से पूर्णतः नाता तोड़कर धार्मिक-आध्यात्मिक दुनिया की ओर बढ़े उनके कदम फिर वापस नहीं मुड़े।

किशोरावस्था में ही महन्त जी ने कैलास मानसरोवर की यात्रा की। यह यात्रा उनके संन्यासी जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई। महन्त जी के अनुसार - ‘‘उत्तराखण्ड के बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री आदि तीर्थस्थलों की यात्रा और अनेक सन्त-महात्माओं से मिलकर अपनी धार्मिक-आध्यात्मिक एवं योग विषयक जिज्ञासाओं की पूर्ति हेतु बात-चीत तथा सत्संग हम संन्यासियों की जीवनचर्या थी। बदरीनाथ यात्रा के दौरान ही कैलास-मानसरोवर जाने की इच्छा जागृत हुई। उस समय कैलास-मानसरोवर का मार्ग और भी दुर्गम था। पैदल यात्रा में लगभग बीस दिन लगते थे। तीन अन्य संन्यासियों के साथ स्थान-नीति को पार कर हम मानसरोवर की यात्रा पर चल पड़े। हम लोगों को यह सूचना थी कि मीठा सत्तू कैलास मानसरोवर के आसपास के निवासी पसन्द करते हैं और छीन लेते हैं; अतः हम लोग नमकीन सत्तू अपने पास रखे हुए थे। कैलास-मानसरोवर की यात्रा से एक अलग तरह की आध्यात्मिक अनुभूति हुई और मन में ईश्वर के साथ-साथ भारत माता की इस विस्तारित भूमि के साथ रागात्मक एकता की अद्भुत अनुभूति हुई। कैलास मानसरोवर की यात्रा से वापस आते समय अल्मोड़ा से कुछ आगे बढ़े ही थे कि मुझे ‘हैजा’ हो गया। अत्यधिक उल्टी-दस्त के कारण मैं अचेत हो गया, मेरे साथ के संन्यासियों ने मान लिया कि अब मेरा जीवित बचना कठिन है, अतः वे मुझे उसी दशा में छोड़कर आगे चल दिये। दैवी कृपा से शाम को मुझे होश आया और शरीर में चेतना का संचार हुआ तो अपने आपको अकेला पाकर इस नश्वर संसार का मर्म समझा। मेरा मन विरक्ति और वेदना से भर गया। मैं अकेले धीरे-धीरे चलते हुए हरिद्वार पहुँचा। अब मुझे लगता है कि इस घटना के पीछे ईश्वर की इच्छा छिपी थी। शायद ईश्वर मुझे ‘सच’ का साक्षात्कार कराना चाहते थे। कैलास-मानसरोवर की इस यात्रा से मेरा मन बहुत विचलित हो चुका था। मैं संसार की नश्वरता के साथ आत्मा की अमरता के ज्ञान की खोज में बेचैन था कि मेरी भेंट योगी निवृत्तिनाथ जी से हो गयी। योगी निवृत्तिनाथ जी के योग, आध्यात्मिक दर्शन तथा नाथपंथ के विचारों से मैं प्रभावित होता चला गया। योगी निवृत्तिनाथ जी का सान्निध्य मुझे अच्छा लगने लगा, उनके साथ रहकर योग-साधना में मुझे शान्ति मिलने लगी। नाथपंथ के सामाजिक समन्वयवादी दृष्टिकोण एवं हठयोग-साधना की ओर मैं खिचता चला गया। यद्यपि कि उस समय तक मैं नाथपंथ में दीक्षित नहीं हुआ था, मात्र ब्रह्मचारी संत था। निवृत्तिनाथ जी के साथ अभी योग-साधना में कुछ माह बीते ही थे कि प्रकृति ने वर्षा ऋतु का स्वागत किया। चूँकि ऋषिकेश में बरसात के मौसम में मच्छर बहुत लगते थे और अक्सर लोगों को मलेरिया हो जाया करता था; अतः संत-महात्मा वर्षा ऋतु में ऋषिकेश से अन्यत्र चले जाते थे। योगी निवृत्तिनाथ जी के साथ मैं भी बंगाल के मेमन सिंह जाने हेतु वर्षावास के लिए चल पड़ा। योगी निवृत्तिनाथ जी द्वारा मैं तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के सामाजिक परिवर्तन, हिन्दुत्व पुनर्जागरण एवं राष्ट्रीयता के प्रति समर्पण एवं जनान्दोलनों के नेतृत्व की चर्चा सुना करता था। इस प्रकार महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के प्रति मेरे मन में श्रद्धा का बीज पहले से ही अंकुरित हो चुका था। मेमन सिंह जाते समय निवृत्तिनाथ जी गोरक्षनाथ मंदिर में एक रात विश्राम हेतु रुके। उन्होंने निवृत्तिनाथ जी की गोरक्षनाथ मंदिर में बड़े ही भावपूर्ण ढंग से आवभगत की। यह घटना 1940 की है। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज से मेरी यह पहली भेंट थी। दूसरे दिन जब हम बंगाल जाने हेतु तैयार हुए तो महन्त जी ने मुझसे अपना शिष्य एवं उत्तराधिकारी बनने की इच्छा व्यक्त की। किन्तु अभी मैं न तो नाथपंथ को ठीक से समझ पाया था और न ही किसी मठ का महन्त बनने के बारे में कुछ सोचा था। संन्यासी जीवन जीते हुए धर्म-दर्शन और योग-साधना के बारे में अभी मैं बहुत कुछ जानने की इच्छा का शमन नहीं कर सकता था, सो बड़ी विनम्रतापूर्वक अपनी अनिच्छा बताकर मैं निवृत्तिनाथ जी के साथ बंगाल के मेमन सिंह के लिए निकल पड़ा। मेमन सिंह में मेरी भेंट उद्भट विद्वान् एवं दार्शनिक अक्षय कुमार बनर्जी से हुई। उनके साथ भारतीय-दर्शन और नाथपंथ के बारे में विस्तार से बातचीत होती रही और मैं वहाँ इनके दर्शन साहित्य का अध्ययन करता रहा। गोरक्षनाथ जी के बारे में एवं गोरक्षदर्शन का अध्ययन करने का भी अवसर मुझे सर्वप्रथम यहीं प्राप्त हुआ।