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राष्ट्र सन्त महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज

भारतीय संस्कृति की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता है आत्मशुद्धि अर्थात् स्वयं शुद्धीकरण की। इसी विशेषता के परिणामस्वरूप वैदिक धर्म में जब कुछ विकार आया तो महात्मा बुद्ध पैदा हुए। जब बौद्ध धर्म में विकार उत्पन्न हुआ तो गुरु श्री गोरक्षनाथ तथा शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ। इस्लामी शासन में जब विकृतियों की सम्भावनाएँ बढ़ीं तो भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। इसी श्रृंखला को बनाये रखने वाले महापुरुषों की जो परम्परा स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, बालगंगाधर तिलक, वीर विनायक दामोदर सावरकर, महामना मदन मोहन मालवीय, डॉ. केशवबलिराम हेडगेवार, सरदार वल्लभ भाई पटेल, माधव सदाशिव गोलवलकर गुरुजी, महन्त दिग्विजयनाथ तक अनवरत दिखाई देती है, गोरक्षपीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज उसी परम्परा के जाज्वल्य नक्षत्र थे। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर के रूप में अवेद्यनाथ जी महाराज ने जिस गुरु का उत्तराधिकार प्राप्त किया वे दिग्विजयनाथ जी महाराज हिन्दुत्व और राष्ट्रीयता की वैचारिक विरासत की एक यशस्वी परम्परा सौंपकर ब्रह्मलीन हुए थे। महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज को अपने गुरुदेव से जो विरासत मिली उसका अन्दाजा इन तथ्यों से लगाया जा सकता है कि - महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज गुलाम भारत में देश की आजादी के लिए कांग्रेस में रहते हुए भी हिन्दू हितों की रक्षा के लिए तत्पर रहते थे। और उन्होंने सदैव कांग्रेस की उन नीतियों का विरोध किया, जिनसे हिन्दू जाति और धर्म के ऊपर किसी प्रकार के आघात की आशंका थी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस जब मुस्लिम तुष्टीकरण के भस्मासुरी मार्ग पर चल पड़ी तो महन्त दिग्विजयनाथ जी ने कांग्रेस छोड़ दी और हिन्दू महासभा के संगठनकर्ताओं की अग्रिम पंक्ति के सिपाही बन गये। 1939 ई. में उन्होंने अखिल भारतवर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा की स्थापना की तथा साधु सम्प्रदाय को एक नवीन दिशा प्रदान की एवं निष्क्रियता और एकान्तिकता के स्थान पर समाज-सापेक्ष कार्यों की ओर प्रेरित किया। भारत की संसद में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने गरजते हुए कहा था- ”जब तक धर्मप्राण भारत की पवित्र भूमि पर गोमाता के रक्त की एक बूँद भी गिरती रहेगी; तब तक देश अशान्ति की भट्ठी में जलता रहेगा। मैं तो हिन्दू धर्म का वकील हूँ, संन्यासी होते हुए राजनीति में केवल इसलिए उतरा हूँ, क्योंकि हिन्दू संस्कृति और सभ्यता पर आज चारों ओर से प्रहार हो रहे हैं।“ वे कहते थे राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई है। किसी भूखण्ड में निवास करने वाले उस समूह को ही राष्ट्र कहा जाता है, जो भू-खण्ड की संस्कृति, सभ्यता, परम्परा, इतिहास आदि को मानता हुआ परस्पर एकता की अनुभूति रखता हो। अतः भारत हिन्दू राष्ट्र है, ऐसा हिन्दू राष्ट्र जहाँ किसी पर अत्याचार नहीं होगा। इस हिन्दू राष्ट्र में रहने वाले प्रत्येक निवासी के साथ न्याय होगा। प्रत्येक नागरिक को अपनी उपासना पद्धति अपनाने की पूर्ण स्वतन्त्रता होगी, परन्तु राष्ट्र के प्रत्येक निवासी को यहाँ की संस्कृति, सभ्यता, परम्परा, इतिहास, साहित्य और राष्ट्रीय महापुरुषों को सम्मान की दृष्टि से देखना होगा। वस्तुतः हिन्दुत्व ही वह शक्ति है जो विस्तृत भारतीय भूभाग वाले विभिन्न भाषा-भाषी करोड़ों जनता को एक सूत्र में बाँध सकती है। इस वैचारिक अधिष्ठान पर निर्मित विराट् व्यक्तित्व के धनी गुरु की भौतिक-आध्यात्मिक विरासत को महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज ने न केवल सँभाला, अपितु गोरक्षपीठ को कई नये आयामों से भी जोड़ा। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के बहुआयामी विराट् व्यक्तित्व को शब्दों की सीमा में बाँध पाना असम्भव है तथापि विविध स्रोतों से ज्ञात किंचित तथ्यों के आधार पर उनके व्यक्तित्व को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज का बचपन का नाम कृपाल सिंह विष्ट था। आपके पिता श्री रायसिंह विष्ट हिमालय की गोद में बसे देवभूमि के पौड़ी गढ़वाल के काण्डी ग्राम के निवासी थे। 18 मई, 1919 को काण्डी ग्राम में जन्मे बालक को कौन जानता था कि एक दिन वह बालक देश-विदेश के हिन्दू धर्माचार्यों का नेतृत्व करेगा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति पूर्णतः समर्पित होकर राष्ट्रीय एकता-अखण्डता के उस यज्ञ का आचार्य बनेगा जिसकी प्रज्वलित अग्निशिखाओं से हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों, विशेषकर छुआछूत को भस्म करने की प्रेरणा एवं सन्देश प्राप्त होगा। किन्तु ईश्वर ने उन्हें भारत भूमि पर इसी महान कार्य हेतु भेजा था सो उसी अनुरूप परिस्थितियाँ करवट लेने लगीं।