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गोरखनाथ-मंदिर, गोरखपुर

योगेश्वर गोरखनाथ ने भगवती राप्ती के तटवर्ती गोरखपुर नगर (जो उन्हीं की पुण्यस्मृति में उन्हीं के नाम विख्यात है) में त्रेतायुग की तपस्या की थी। उनकी तपःस्थली के निकट मानसरोवर स्थान आज भी उनकी साधना का स्मारक है। वे ज्वाला देवी के स्थान से खिचड़ी की भिक्षा माँगते हुए गोरखपुर पधारे थे। महाराज मानसिंह ने अपनी ‘श्रीनाथतीर्थावली’ पुस्तक में गोरखपुर का उल्लेख करते हुए कहा है कि गोरखपुर नामका उत्तम स्थान है उसके उत्तर (भाग) में पुण्यप्रद गोरक्षनाथ जी का स्थान है, श्रीरामजी के त्रेतायुग में अवतार में इस स्थान का वर्णन उपलब्ध होता है। इस स्थान में एक कोस (तीन किलोमीटर) पर इरावती (राप्ती) नदी बहती है, यहाँ श्री गोरखनाथ जी की काष्ठपादुका विद्यमान है। इस तीर्थवरेण्य को बार-बार नमस्कार है।

गोरखनाथ-मंदिर, गोरखपुर का वर्णन मध्यकालीन प्रेमाख्यानकार कवि उस्मान ने चित्रावली में भी किया है जिससे पता चलता है कि मन्दिर के वातावरण में अनवरत योग-साधना का क्रम चलता रहा है। गोरखपुर में स्थित गोरखनाथ-मंदिर का भव्य निर्माण उसी पवित्र स्थान पर सम्पन्न हुआ है, जहाँ ज्वाला देवी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए आकर गोरखनाथजी ने तपस्या की थी। इसके निकट ही मानसरोवर नामक तड़ाग से इसकी पवित्रता और दिव्यता जन-मानस को आज भी प्रेरित करती आ रही है। गोरखनाथ-मन्दिर बावन एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित है तथा सुन्दर आकर्षक वृक्षों, फूलों और हरी घास के सुन्दर मैदानों से इसकी रमणीयता नित्य निरन्तर बढ़ती रहती है। ऐतिहासिक अनुशीलन करने पर पता चलता है कि गोररखनाथ-मन्दिर का रूप, आकार-प्रकार समय-समय पर परिस्थितियों और सुविधा के अनुसार बदलता रहा है। भारत में मुस्लिम राजत्व के प्रारम्भिक चरण में इस मन्दिर से प्रवाहित यौगिक साधना की लहर समग्र एशिया में फैल रही थी। जिस तरह भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट तत्वज्ञान चीन, जापान में सम्राट अशोक, कनिष्क और हर्ष के शासनकाल में भारतीय प्रतिष्ठा का मानदण्ड बन गया था, ठीक उसी तरह विक्रम की आठवीं शताब्दी के पहले से ही नाथ सम्प्रदाय का योगमहाज्ञान बड़ी तेजी से भारतीय सीमा को लाँघ कर करोड़ों-करोड़ों लोगों को संतृप्त कर रहा था। इस पवित्र कार्य में गोरखनाथ-मन्दिर से प्रस्फुटित आध्यात्मिक योगज्ञान रश्मि की भूमिका महनीय तथा स्पष्ट है। ऐसी स्थिति में विदेशी यवनशासकों की कुदृष्टि गोरखनाथ-मन्दिर की ओर गयी और उन्होंने इसके पवित्र साधनापरक कार्य में अवरोध उपस्थित करने के लिए उत्तरांचल के इस महत्तम योगदुर्ग का ध्वंस अपने साम्राज्य-विस्तार के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक उपक्रम समझा। विक्रमीय चौदहवीं शती में भारत के मुस्लिम सम्राट खिलजी ने अपनी कट्टर धर्मनीति से प्रभावित होकर गोरखनाथ-मन्दिर (गोरखपुर) को ध्वस्त करने का उपक्रम किया तथा आगे चलकर विक्रमीय सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के सन्धिकाल में अपनी धार्मिक कट्टरता के लिये इतिहास प्रसिद्ध सम्राट औरंगजेब ने अलाउद्दीन खिलजी की तरह मन्दिर को ध्वस्त करने में अपनी शक्ति का प्रयोग किया, पर गोरखनाथ मन्दिर की पूजा-पद्धति, धार्मिक आचार-विचार और सार्वजनिक श्रद्धा, उसकी पवित्रता पर किसी भी प्रकार का आघात असम्भव था। इस मन्दिर के यवन-शासकों द्वारा क्षतिग्रस्त किये जाने पर भी इसके पुनर्निर्माण में मन्दिर के संरक्षकों और योगाचार्य ने किसी भी तरह का व्यवधान नहीं उपस्थित होने दिया। विक्रमीय उन्नीसवीं शताब्दी के द्वितीय चरण में गोरखनाथ-मन्दिर का अच्छे ढंग से सुचारु रूप से जीर्णोद्धार किया गया। तभी से निरन्तर मन्दिर के आकार-प्रकार के संवर्धन समलंकरण तथा मन्दिर से सम्बन्धित उसी के प्रांगण में स्थित अनेकानेक विशिष्ट देवस्थानों के जीर्णोद्धार, नवनिर्माण आदि में गोरखनाथ मन्दिर के अनेकानेक महन्तों द्वारा योगदान होता आ रहा है। वर्तमान गोरखनाथ मन्दिर, गोरखपुर की भव्यता और पवित्र रमणीयता लोकचिन्तन की अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। इसके भव्य और (श्रीगोरखनाथ की योगसिद्धि-शक्ति के अनुरूप) गौरवमय निर्माण का श्रेय अत्यन्त महिमाशाली, भारतीय संस्कृति के महान कर्णधार योगिराज ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथजी महाराज और उनके अत्यन्त सुयोग्य शिष्य गोरक्षपीठाधीश्वर, योगदर्शन के गम्भीर विद्वान ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथजी महाराज को है। इनके संरक्षण में गोरखनाथ-मन्दिर, गोरखपुर के विशाल आकार-प्रकार और उसके प्रांगण की भव्यता समृद्धि तथा गरिमा का शब्दांकन नाथ परम्परा के ही इतिहास में नहीं, भारतीय वास्तुकला के क्षेत्र में एक मौलिक और श्रद्धास्पद प्रयास है। मन्दिर के भीतरी कक्ष में मुख्य वेदी पर शिवावतार अमरकाय महायोगी गुरु गोरखनाथजी महाराज की श्वेत संगमरमर की दिव्य मूर्ति ध्यानावस्थित रूप में प्रतिष्ठित है, इस मूर्ति का दर्शन मनमोहक और चित्ताकर्षक है। यह सिद्धिमयी दिव्य योगमूर्ति है। श्रीगुरु गोरखनाथजी की चरण-पादुकाएँ भी यहाँ प्रतिष्ठित हैं जिनकी विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। प्रातःकाल ब्रह्मबेला के पहले ही घण्टों, नगाड़ों के तुमुल घोष के साथ भगवान गोरखनाथ के दिव्य श्रीविग्रह की पूजा आरम्भ हो जाती है, मध्याह्न में भी पूजा का क्रम चलता है और सायंकाल निश्चित समय से नियतकाल तक पूजा-आरती आदि का कार्यक्रम चलता है। प्रतिदिन मन्दिर में भारत के सुदूर प्रान्तों से आये पर्यटकों, यात्रियों और स्थानीय तथा आस-पास के असंख्य लोगों की भीड़ दर्शन के लिए आती रहती है पर मंगलवार को दर्शनार्थियों की संख्या अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है। मन्दिर में गोरखबानी की अनेक सबदियाँ संगमरमर की भित्ति पर अर्थसहित अंकित हैं और नवनाथों के चित्रों का अंकन भी विद्यमान है।