ऊँ नमो भगवते गोरक्षनाथाय | धर्मो रक्षति रक्षितः | श्री गोरक्षनाथो विजयतेतराम | यतो धर्मस्ततो जयः |     Helpline 24/7: 0551-2255453, 54

मान्यताएं:-

क्रुद्ध होकर विमाता ने अपने वशवर्ती राजा का कान भरा और पूरन को अन्धा बनाकर उसके हाथ पैर तोड़वा कर कूप में डलवा दिया। उन्हें वहाँ से निकालकर श्री मत्स्येन्द्रनाथजी और गोरखनाथ जी ने अपने आशीर्वाद से पूर्ववत पुनः पूर्णांग बना दिया। पूरन की माँ भी पुत्र वियोग में अन्धी हो चुकी थी। गोरखनाथजी के आशीर्वाद से सिद्ध बने पूरन ने अपने पिता के पास लौटकर अपनी माता को भी दृष्टि दी। उसने अपनी विमाता को भी क्षमा कर दिया। पिता ने पूरन को राज्य देना चाहा किन्तु उन्हें तो वैराग्य हो चुका था। अतः वे राजपाट छोड़कर गुरु गोरखनाथ जी के पास लौट आये। वहीं पूरन भगत बाद में एक महान सिद्ध चौरंगीनाथजी नाम से लोक प्रसिद्ध हुए।

पंजाबी प्रेम कथाओं में रांझाका नाम अमर है। हीर को पाने में असफल विरह विकल रांझा बाद में गोरखनाथजी से तत्वज्ञान प्राप्त कर एक योगी बना। भर्तृहरि की बहन मैनावती और उसके पुत्र बंगाल के राजा गोपीचन्द ने भी गोरखनाथ जी से प्रभावित होकर योगदीक्षा ली थी। लोक प्रचलित इस कथा की पुष्टि गोरखबानी से भी होती है जिसमें भर्तृहरि और गोपीचन्द दोनों के गुरु (गोरखनाथ) के उपदेश से योगसाधना में तत्पर परमपद में प्रतिष्ठित होने की चर्चा है।

गोरखनाथ जी ने उड़ीसा के एक क्षत्रिय योद्धा विबुधेन्द्रमल्ल को भी उसका अज्ञान दूर कर योगदीक्षा प्रदान की थी जो बाद में योगिराज माल्लिकानाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सिन्धियों के परम आराध्य श्री झूलेलालजी भी गुरु गोरखनाथजी के शिष्य थे और सिख सम्प्रदाय के प्रवर्तक आदिगुरु नानकदेवजी ने तो जपुजी में गोरखनाथजी को गुरुत्व में ब्रह्मा और विष्णु के समकक्ष बैठा दिया है। चौदहवीं शती के सन्त कबीर से भी गोरखनाथजी के प्रत्यक्ष संवाद की कथा लोक में प्रसिद्ध है। मगहर के पास आज भी एक जलाशय दिखाते हुए लोग कहते हैं कि यहीं गोरखनाथजी और कबीर की भेंट हुई थी। विक्रम की सोलहवीं शती में विद्यमान विस्नोई सम्प्रदाय के प्रवर्तक जम्भनाथ (जम्भोजी), निरंजनी सम्प्रदाय के प्रवर्तक हरिदास निरंजनी तथा जसनाथी सम्प्रदाय के जसनाथ जी को भी महायोगी गोरखनाथजी ने ही दर्शन और योग दीक्षा देकर कृतार्थ किया था यह बात भी सर्वविदित है।

रमतायोगी श्री गोरखनाथ जी द्वारा अनेक स्थानों पर की गयी साधना और तपश्चर्या के कारण तीर्थ-स्थल बने अनेक स्थान आज भी मिलते हैं। उनके द्वारा स्थापित अनेक साधना केन्द्र आज भी विद्यमान हैं जहाँ श्रद्धालु भक्तजन जुटते हैं, मेले लगते हैं। किन्तु उनकी समाधि स्थली कहीं नहीं मिलती है। इसलिए गोरखनाथजी के भक्तों और अनुयायियों का यह दृढ़ विश्वास है कि ये अब भी अमर योग शरीर से विद्यमान हैं और कभी-कभी भक्तों को दर्शन भी देते हैंं। सन्तप्रवर कबीरदासजी ने भी इनकी अमरता की बात कही है - ‘साखी गोरखनाथ ज्यूं अमर भये कलिमाहि।’

अस्तु विभिन्न कालखण्डों में श्रीगोरखनाथजी के अस्तित्व और प्राकट्य के उल्लेखों को देखते हुए उन्हें प्राकृत जन की तरह देश काल की सीमाओं में बाँधने का ऐतिहासिकों का प्रयास वास्तविक नहीं लगता है। अतः जैसा कि नाथपंथ और लोक परम्परा में विश्वास किया जाता है उन्हें एक रससिद्ध, सिद्धकाय. जीवनमुक्त, अयोनिज, अमरमहायोगी रूप में स्वीकार करना ही सर्वथा समीचीन है।