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मान्यताएं:-

यज्ञोपवीत संस्कार-

स्थानीय भाषा में इसको जनेऊ संस्कार भी कहा जाता है। जन सामान्य की आस्था है कि मन्दिर परिसर में यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार करवाने से बालक में नौ दैवीय गुणों का निवास होता है तथा वह बालक पितृ- ऋण, देव- ऋण और ऋषि - ऋण का निर्वहन इसी जन्म में कर लेता है।

रोग-व्याधि से मुक्ति की मान्यता-

रोग और व्याधियों से मुक्ति पाने के लिए दूर-दराज के क्षेत्र से जनता आती है। इसके लिए पीड़ित या तो श्री त्रिशूल भैरव मन्दिर में त्रिशूल चढ़ाकर व्याधि से मुक्ति की कामना करते हैं या कड़ाही (कराही) चढ़ाने की मनौती मानते हैं।

भूत-प्रेत से मुक्ति की मान्यता-

ऐसा विश्वास है कि गुरु गोरक्षनाथ मन्दिर में श्रीनाथ जी के दर्शन से दुष्ट आत्माओं का विनाश होता है तथा अखण्ड धूना की भभूति लगाने से दुष्ट आत्माएं मनुष्य के निकट नहीं आतीं। भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति पाने के लिए शहरी और ग्रमीण क्षेत्र की जनता श्रीनाथ जी के दर्शन करने दूर-दराज क्षेत्रों से आती है।

नेपाल के शाह राजवंश पर गोरखनाथ जी की महती कृपा की कहानी भी प्रसिद्ध है। श्रीनाथ जी के आशीर्वाद से ही शाह राजवंश के संस्थापक महाराजा पृथ्वीनारायण शाह को वह शक्ति मिली थी जिसके बल पर उन्हें बाईसी और चौबीसी में बँटे नेपाल को एकछत्र के नीचे संगठित करने में सफलता मिली। इसी उपकार की स्मृति में तब से आज तक नेपाल की राज-मुद्रा में श्री गोरखनाथ नाम तथा राजमुकुटों में उनकी चरणपादुका का चिह्न अंकित रहा है। आठवीं शताब्दी में मेवाड़ के हिन्दुआ सूर्य वाप्पारावल को गोरक्षनाथजी ने वरदानी खड्ग प्रदान किया था, जिसके बल पर उन्होंने सुदूर खुरासान तक अपनी विजय पताका फहराई थी। विजयादशमी के अवसर पर आज भी इस खड्ग की पूजा होती है। नेपाल में एक प्रखण्ड दांग के राजकुमार रत्न-परीक्षक ने गोरक्षनाथ से दीक्षित होकर दीर्घायु का उपभोग करते हुए सिद्ध बाबा रत्ननाथ के नाम से एशिया के अनेक भागों को अपनी योगसिद्धियों से चकित कर दिया था। कहते हैं कि मुस्लिम धर्म प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद के साथ भी इन्होंने सत्संग किया था तथा हाजी रतननाथ के रूप में भी इनकी प्रसिद्धि थी। गोरखनाथजी ने इन्हें शिष्य बनाकर एक अमृत पात्र दिया था। यह एक पाषाण लिंग है। कहते हैं कि इसमें श्रीनाथजी की आत्मा प्रतिष्ठित है। दांग में एक विशाल मंदिर का निर्माण कराकर रतननाथ जी ने इस अमृत पात्र की पूजा का उपक्रम किया जो आज तक प्रवर्तमान है।

गोरखनाथजी ने नेपाल और भारत की सीमा पर स्थित प्रसिद्ध शक्तिपीठ देवीपाटन में आदि शक्ति मां भगवती की आज्ञा से तपस्या की थी। प्रसिद्ध है कि दक्ष यज्ञ में प्राणों की आहुति देने वाली सती माता के निष्प्राण शरीर को लेकर महादेव के भ्रमण करते समय देवी का पट वामस्कन्ध सहित इसी पाटन पुण्य क्षेत्र में गिरा था। उसी स्थल पर पाटेश्वरी शक्तिपीठ की स्थापना महायोगी श्री गोरखनाथजी द्वारा की गई। जैसा कि देवीपाटन में उपलब्ध शिलालेख (1874 ई.) में भी अंकित हैः
महादेव समाज्ञप्तः सती स्कन्धविभूषिताम्। गोरक्षनाथोंयोगीन्द्रस्तेने पाटेश्वरीमठीम्।।

अमर योगी गोरखनाथ जी ने उज्जयिनी के राजा भर्तृहरि को भी अपना शिष्य बनाया था। ‘भर्तृहरि’ नामक नाटक के रचयिता हरिहर ने तो ऐसा लिखा ही है, स्वयं भर्तृहरि ने अपनी एक सबदी - ‘सतगुर सवदै सीधा भरथरी । गुरु गोरख वचन प्रमाणं जी ।’ में यह घोषणा की है ।

स्यालकोट के राजा सालिवाहन के पुत्र पूरन भगत की कहानी सारे पंजाब में और सुदूर अफगानिस्तान तक प्रसिद्ध है। मियाँ कादरयार की लिखी हुई एक पंजाबी कहानी पर ‘संग पूरन भगत’ गुरुमुखी अक्षरों में छपी है। तदनुसार पूरन भगत उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के वंशज थे, उनके बाप-दादों ने स्यालकेाट के थाने पर अधिकार कर लिया था। पूरन भगत यहीं के राजा सालिवाहन के पुत्र थे। उनकी लूना नामकी विमाता ने उनसे गलत सम्बन्ध बनाना चाहा किन्तु पूरन भगत ने अस्वीकार कर दिया। ...